इंग्लैंड की टीम ने तलाशी लुप्तप्राय गोल्डन महासीर की संभावनाएं
सघन वन क्षेत्र से लगे नदियाें में इसकी संभावना का अनुमान लगाते हुए छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु प्रवर्तन विभाग ने इसका सर्वे करने का निर्णय लिया है।
कोरबा। गोल्डन महासीर एक ऐसी मछली है जिसे भारतीय नदियों का बाघ भी कहा जाता है। जिस तरह से बाघ पाए जाने वाले जंगल को संरक्षित और पूर्ण रूप से अनुकूलित वन माना जाता है। उसी तरह गोल्डन महासीर जिस नदी अथवा सरोवर में पाई जाती है उसकी जल के प्राकृतिक मापदंड को पूर्णत: शुद्ध माना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम टोर पुतिटोरा है। इसका वजन अधिकतम 50 किलो ग्राम होता है। इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर (आइयूसीएन) ने हाल ही में इसे लुप्तप्राय स्थिति का दर्जा दिया है। सघन वन क्षेत्र से लगे नदियाें में इसकी संभावना का अनुमान लगाते हुए छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु प्रवर्तन विभाग ने इसका सर्वे करने का निर्णय लिया है।
इंग्लैंड की विशेषज्ञ टीम को निदेशालय ने सर्वे का दायित्व दिया गया है। इस कड़ी में डा. एवरार्ड ने टीम के सदस्यों ने मंगलवार बुका में कैंप लगाकर मछुआरों से चर्चा की। मछलियों के चित्र मछुआरों को दिखाकर यह जानने का प्रयास किया कि किस तरह की मछलियां क्षेत्र में पाई जाती हैं। साथ ही यह जानने का प्रयास किया कि जिस तरह की छोटी मछलियाें को गोल्डन महासीर खाती है, वह इस क्षेत्र में पाया जाता है या नहीं। वन मंडलाधिकारी कुमार निशांत ने बताया कि कटघोरा वन क्षेत्र वन्य जीवों की विविधता से भरा है। इसके बीच से होकर बहने वाली हसदेव नदी इन जीवों के लिए अनुकूल है। गोल्डन महासीर का यहां अस्तित्व है या नहीं यह शोध का विषय है। जिस पर इन दिनों काम चल रहा। अस्तित्व पाए जाने पर नदी को संरक्षित करने की दिशा में व्यापक कदम उठाया जाएगा। जिस तरह का अनुकूल पर्यावरण है उससे यह अनुमान लगाया जा रहा है, हसदेव नदी में पहले इस मछली का अस्तित्व रहा होगा। लगातार मत्स्य आखेट और संरक्षण के अभाव में अब यह दिखाई नहीं देता। अधिकारी ने यह भी बताया मछली के अस्तित्व मिलने पर इसके संवर्धन के लिए अतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मिलेगा। महसीर मछली पहले भारत के बड़ी नदियों में भी पाई जाती थी लेकिन नदियों में बढ़ी प्रदूषण की वजह से उनका अस्तित्व लुप्तप्राय हो गया। उन्होने बताया टीम ने नदी के अलावा बांगों के डूबान क्षेत्र का सर्वे किया। टीम में इंग्लैंड के विशेषज्ञों के साथ भारतीय विशेषज्ञ भी शामिल हैं। यह टीम छत्तीसगढ़ में पछले सात दिनों से सर्वे कर रही है। इस कड़ी में आठवे दिन कोरबा पहुंची थी। बुधवार को यह टीम वापस चली जाएगी। स्थानीय स्तर पर सर्वे कार्य आगे भी जारी रहेगा। टीम के विशेषज्ञों ने इसके मछुआरों को प्रशिक्षित भी किया है।
कटघोरा वनमंडल के डीएफओ कुमार निशांत ने बताया कि डा. मार्क एवरार्ड इंग्लैंड के एक लेखक, वैज्ञानिक और प्रसारक हैं। जिनकी पर्यावरण और स्थिरता, मछलियों के बारे में जानकारी व संगीत की दुनिया में व्यापक भागीदारी है। मार्क का काम, जल संरक्षण के लिए शोध करने के साथ उन पर किताबें भी लिखना है। सभी के लिए स्वच्छ पानी में योगदान देने के लिए यह उनके व्यक्तिगत मिशन का हिस्सा है। उनके सहयोग अब महासीर मछली के शोध के मिशन को पूरा किया जाएगा।
ये है प्राचीन मान्यता
गोल्डल महासीर मछली का इतिहास बहुत पुराना है। भले ही इसे मांसाहार का हिस्सा माना जाता है लेकिन इसकी धार्मिक मान्यताएं भी है। पुराने समय में राजा-महाराजा अपने ध्वज में इसका चित्र लगाते थे। इस मछली काे वृहत मात्रा में सरोवरों भी पाला जाता था। राजओं के मुकुट में इसके प्रतीक को स्थान मिलता था। इसे विजय का प्रतीक भी माना जाता था। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में एक मछली अवतार भी है। इस भगवान ने महासरी मछली के रूप में लिया था ।



