गर्मी में जल स्त्रोत सूखने से अब वन्य जीव नहीं रहेंगे प्यासे
जंगल के भीतर गर्मी के दौरान सूख जाने वाले जल स्त्रोतों में वर्ष भर पानी रहे, इसके लिए बोल्डर डेम का निर्माण किया जाएगा।
कोरबा । गर्मी के दिनों में जंगल के जल स्त्रोत सूखने से हिरण, चीतल, बंदर, भालू सहित अन्य वन्य जीव भटक कर रहवासी क्षेत्र की ओर आते हैं। जहां हर साल कुत्तों के शिकार अथवा वाहनों के चपेट में आने के कारण इनकी मौत हो जाती है। इस समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए मड़वारानी पहाड़ सहित आसपस विभिन्न 12 स्थानों में सासरपीट यानी कृत्रिम पानी टैंक का निर्माण किया जाएगा। वन्य जीव संरक्षण मंद से होने वाले कार्य के लिए स्थल का चिंहांकन किया जा रहा है।
कोरबा वन जैव विविधताओं से भरा है। गर्मी आते इन जीवों के लिए पेयजल का संकट खड़ा हो जाता है। पहाड़ के जंगल के पर निर्भर रहने वाल वन्य जीवों के लिए यह समस्या और भी अधिक विकट है। पतझड़ का मौसम शुरू होने वाली है। जल स्त्रोत भी कम होने लगा है। ग्रीष्म तेज होते जंगल के सभी प्राकृतिक स्त्रोत सूख जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण उपर में पानी सूखने के वन्य जीव अपना रहवास स्थल छोड़ कर मैदानी क्षेत्र की ओर आने लगते है। वन्य जीव पहाड़ पर ही अपने यथा स्थान पर रहें इसके लिए सासर पीट का निर्माण पहाड़ के उपर किया जाएगा। वन विभाग के अधिकारी की माने तो सासरपीट पहाड़ी क्षेत्रों मे जल संरक्षण का वह उपाय है जिसमें तहत जंगल में गड्ढा खोदकर उसमें मोटा पालीथीन बिछा दिया जाता है, और पानी भर दी जाती है। इससे पानी को मिट्टी नहीं सोख पाता और वन्य जीवों के प्यास बुझाने के लिए यह सहायक होता है। इसके निर्माण में अधिक लागत नहीं आती। सासरपीट के निर्माण से जंगल की जैव विविधता संरक्षित रहेगी। मड़वारानी पहाड़ न केवल जंगली जीव बल्कि तीतर, मोर, बटेर, उड़न गिलहरी आदि के लिए भी अनुकूल है। जल संरक्षण के अभाव में इनका भी अस्तित्व अब खतरे में आ गया है। पहाड़ के उपर पानी पहुंचाने के लिए पाइपलाइन का उपयोग किया जाएगा। मैदानी क्षेत्र में ऐसे स्थान पर बोर खनन किया जाएगा जहां भू-जल स्त्रोत बेहतर हो। पहाड़ तक पानी पहुंचाने की सुविधा होने से ग्रीष्म में सूख जाने जाने वाले पेड़ भी संरक्षित रहेंगे। बताना होगा कि मड़वारानी पहाड़ को वन औषधीय जड़ी बूटी संर्वधन के लिए वन विभाग की ओर से प्रस्तावित किया है। ग्रीष्म में पहाड़ तक पानी पहुंचानें की सुविधा विकसित होने से वन औषधीय संवर्धन को भी बढ़ावा मिलेगा।
कुत्तों में बढ़ रही शिकार की प्रवृत्ति
हिरण चीतल जैसे जंगली जीवों की सर्वाधिक मौत मड़वारानी पहाड़ से लगे आसपास गांवों होती। हर साल होने वाली इस घटना के कारण गांव के कुत्तों में शिकार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वन्य जीवों को कुत्तों के शिकार से बचाने के लिए जंगल में सासरपीट का निर्माण किया जाएगा। बताना होगा कि अकेले कोरबा वनमंडल दमऊ व मड़वारानी क्षेत्र के आपास दो साल के भीतर 100 से भी हिरण व चीतल का कुत्ते का झुंड शिकार कर चुके हैं। पहाड़ से उतर कर वन्य जीवों के मैदानी क्षेत्र में आने
मड़वारानी एनीकट को नहीं मिली अनुमति
मड़वारानी पहाड़ सहित आसपास के 23 गांवों पेयजल आपूर्ति के लिए जल संसाधन विभाग हसदेव नदी में मड़वारानी एनीकट निर्माण के लिए 48 करोड़ की कार्य योजना तैयार की है। निर्माण को मूर्तरूप देने और बजट में शामिल करने के लिए पिछले तीन साल शासन का भेजा जा रहा है। स्वीकृति के अभाव में यह योजना अब कागजों में सिमट गई है। एनीकट बनने पहाड़ी क्षेत्र से लगे गांवों के लिए न केवल सिंचाई सुविधा की विस्तार होगी बल्कि वन्य जीवोें के लिए क्षेत्र संरक्षित होगा।
कटघोरा वन मंडल में भी चल रही तैयारी
वन्य जीवों को ग्रीष्म में समय जंगल में पेयजल उपलब्ध हो सके इसके लिए कटघोरा वन मंडल में भी तैयारी चल रही है। पूर्व में तैयार किए जा चुके जल स्त्रोंतों मरम्मत व रख रखाव के लिए वन्य जीव संरक्षण मद से राशि प्रस्तावित की जाएगी। वन मंडलाधिकारी कुमार निशांत ने बताया कि जंगल के भीतर गर्मी के दौरान सूख जाने वाले जल स्त्रोतों में वर्ष भर पानी रहे, इसके लिए बोल्डर डेम का निर्माण किया जाएगा। हाथियों के चारा प्रबंधन के तहत जल स्त्रोत वाले स्थानों में बांस की भी रोपणी की जाएगी। इससे हाथी जंगल के बजाए रहवासी क्षेत्र की ओर कूच नहीं करेंगे।
वन्य जीवों के संरक्षण के विभागीय स्तर लगातार कार्य किए जा रहे हैं। गर्मी के समय छोटे वन्य जीव जंगल से भटक कर रहवासी क्षेत्र की ओर आते हैं। जहां वाहन की चपेट अथवा कुत्तों के शिकार से उनकी मौत हो जाती है। मड़वारानी पहाड़ के आसपास क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं अधिक होती है। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए सासर पीट का निर्माण किया जाएगा।
आशीष खेलवार, एसडीओ कोरबा वनमंडल



